सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) भारत की पहली महिला शिक्षिका, समाज सुधारक और महिला अधिकारों की अग्रदूत थीं। उन्होंने 19वीं शताब्दी में महिलाओं और दलितों की शिक्षा के लिए क्रांतिकारी कार्य किए। सावित्रीबाई फुले और उनके पति महात्मा ज्योतिराव फुले ने भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयों जैसे जातिवाद, लिंग भेद और अशिक्षा के खिलाफ संघर्ष किया।
सावित्रीबाई फुले का प्रारंभिक जीवन
सावित्रीबाई फुले का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में ज्योतिराव फुले से हुआ। उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन ज्योतिराव फुले ने सावित्रीबाई को शिक्षित किया और उन्हें समाज सुधार के कार्यों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
शिक्षा और शिक्षिका के रूप में योगदान
✔ भारत की पहली महिला शिक्षिका – सावित्रीबाई फुले ने समाज की परवाह किए बिना शिक्षा ग्रहण की और 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।
✔ महिला शिक्षा का प्रसार – उन्होंने अपने जीवनकाल में 18 से अधिक स्कूल स्थापित किए जिनमें लड़कियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के बच्चों को शिक्षा दी जाती थी।
✔ जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष – वे उन गिने-चुने समाज सुधारकों में से थीं जिन्होंने महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
✔ बाल विवाह और सती प्रथा के विरोध में आंदोलन – उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया और बलात्कार पीड़ित महिलाओं और विधवाओं के लिए आश्रय स्थल की स्थापना की।
सामाजिक सुधार और योगदान
1. महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष
सावित्रीबाई फुले ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि महिलाओं और दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किए।
2. विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए आश्रम
उन्होंने बाल विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए 1854 में "बालहत्या प्रतिबंधक गृह" (Infanticide Prevention Home) की स्थापना की, जहां महिलाओं को सुरक्षित रखा जाता था और उन्हें आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दी जाती थी।
3. समाज में समानता लाने के प्रयास
✔ 1863 में गर्भवती विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए पहला आश्रय खोला।
✔ 1868 में दलितों को मंदिरों और कुओं से पानी लेने की अनुमति दिलाने के लिए आंदोलन किया।
✔ विवाह के समय दहेज और जातिगत भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया।
महामारी के दौरान सेवा और निधन
1897 में भारत में बुबोनिक प्लेग (Bubonic Plague) महामारी फैली। सावित्रीबाई फुले बीमारों की सेवा में दिन-रात लगी रहीं। जब वे एक मरीज की सेवा कर रही थीं, तब वे स्वयं इस बीमारी की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।
सावित्रीबाई फुले की विरासत
सावित्रीबाई फुले ने भारतीय समाज में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
✔ भारत सरकार ने 1998 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।
✔ 3 जनवरी को "महिला शिक्षक दिवस" (Women's Teacher Day) के रूप में मनाया जाता है।
✔ उनके नाम पर कई विश्वविद्यालय, पुरस्कार और सामाजिक कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका ही नहीं बल्कि महिला अधिकारों और सामाजिक सुधार की प्रतीक थीं। उन्होंने अपने पूरे जीवन को शिक्षा, सामाजिक समानता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित किया। उनका संघर्ष और योगदान आज भी महिलाओं और समाज सुधारकों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है।